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अंगदान दिवस पर विशेष : हर साल कम से कम 5 लाख लोगों की जान बच सकती है

हर साल कम से कम 5 लाख भारतीयों की मौत अंग काम ना करने के कारण हो जाती है. एक रिपोर्ट के अनुसार अपने अच्छे क्रियाशील अंगों को दान कर कोई भी व्यक्ति आठ से ज्यादा जीवन बचा सकता है. अगर आप भी अंगदान करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको लिखित अनुमति देनी होगी जिसमें यह लिखा होगा कि मृत्यु के बाद मेरे शरीर के अंग पीडि़त रोगियों के सहायता के लिए रोगियों को नया जीवन देने के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है.

विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि हृदय, लिवर, गुर्दा, पेनक्रियाज, आंखे, फेफड़े, त्वचा, मुलायम ऊतक आदि अंग किसी अन्य जरूरतमंद व्यक्तियों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है. शवों के आधार पर होने वाला अंगदान मरने वाले व्यक्ति के परिवार और संबंधियों की दयालुता पर ही निर्भर करता है. इसी कारण हर साल 13 अगस्त को अंगदान दिवस पर अंगदान की प्रतिज्ञा करने वाले व्यक्ति एवं उसके परिवार के लोगों को बुलाकर इस बात का स्मरण कराया जाता है कि उन्होंने अपना अंगदान का संकल्प लिया है.

अंगदान और प्रत्यारोपण ‘‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (टीएचओए) 1994’’ के अंतर्गत आता है, जो फरवरी 1995 से लागू हुआ. वर्ष 2011 में इस अधिनियम में संशोधन कर ऊतक दान को भी इसके अंतर्गत लाने का प्रावधान किया गया है. अंगदान मस्तिष्क मृत्यु होने पर ही किया जा सकता है. इस प्रकार की मृत्यु में मस्तिष्क तो काम करना बंद कर देता है, परन्तु शरीर के अनेक अंग एवं हृदय कुछ समय तक काम करते रहते हैं. ऐसे समय में मृतक के परिजनों की सहमति और अंत में कागजी कार्रवाई के पूरे होने के बाद ही अंगदान की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.

अधिनियम के अनुसार किसी व्यक्ति का ब्रेनडेड घोषित करने के लिये चार डॉक्टरों की एक टीम (जिसमें एक न्यूरोलॉजिस्ट अवश्य होगा) ही करेगी. डॉक्टरों द्वारा मृत्यु की घोषणा के पश्चात ही अंगों को निकाला जा सकता है. व्यक्ति की आंखे किसी भी प्रकार की मृत्यु के पश्चात दान दी जा सकती है. चिकित्सकीय अनुसंधान के लिये कोई भी व्यक्ति अपनी अंतिम इच्छा के वसीयत पर हस्ताक्षर के पश्चात अपने शरीर का दान कर सकता है. अंगदान से आगे बढ़कर व्यक्ति देह दान करे तो उसका शरीर चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों के प्रशिक्षण के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है. चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रैक्टिल ट्रेनिंग के लिये मृत शरीर (कैडेवर) की आवश्यकता होती है. मगर जहां चार छात्रों के अध्ययन के लिये एक कैडेवर की आवश्यकता होती है, आज 30 से 35 छात्र पर एक कैडेवर अध्ययन के लिये उपलब्ध हो पाता है.

भारत में प्रति दस लाख लोगों में केवल 0.16 लोग ही अंगदान करते हैं जो बेहद कम है. यूरोप में यह आंकड़ा 27, अमेरिका में 25 और स्पेन में 35 है. भारत में प्रतिवर्ष 25 हजार अंगदान करने वालों की जरूरत है, जबकि इनकी संख्या (आंखों को छोड़कर) मुश्किल से सैकड़ों में है. भारत में हर साल लगभग एक लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं होती हैं. जिनमें से अधिकतर मौत मस्तिष्क आघात के कारण होती है. यदि इन सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले अंगदान करने लगे तो भारत में हर साल कम से कम 5 लाख जानें बचाई जा सकती है.