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नेताजी ने बढ़ाया था टाटा के मजदूरों का सम्मान

वीरेंद्र ओझा, जमशेदपुर।इंडियन सिविल सर्विस की नौकरी छोड़कर गुलामी की जंजीर तोड़ने का संकल्प रखने वाले नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने टाटा के मजदूरों का भी सम्मान बढ़ाया था। आजाद हिंद फौज की स्थापना करने से पहले नेताजी न केवल जमशेदपुर आए, बल्कि वे वर्ष 1928 से 1936 तक टाटा वर्कर्स यूनियन (तब लेबर एसोसिएशन) के अध्यक्ष भी रहे। बात 1928 की है। टाटा के कामगार हड़ताल पर चले गए थे। कई महीनों से चली आ रही विभागीय हड़ताल एक जून से पूरी कंपनी में फैल चुकी थी।

दीनबंधु सीएफ एंड्रयूज के जमशेदपुर से चले जाने के बाद लेबर एसोसिएशन नेतृत्व विहीन हो गया था। पं. मोतीलाल नेहरू और एटक के महासचिव एनएम जोशी भी हड़ताल समाप्त करने में विफल हो गए थे। इसी बीच 11 अगस्त को टाटा प्रबंधन से हड़ताली मजदूरों को चेतावनी मिली कि 20 अगस्त तक काम पर नहीं लौटे, तो उनकी सेवा समाप्त समझी जाएगी। नई भर्ती ली जाएगी। इसके बाद मजदूरों में खलबली मच गई। यहां मजदूरों का नेतृत्व कर रहे लेबर एसोसिएशन के जी. शेट्टी, मणि घोष, शर्मा, सुंदरम आदि कोलकाता गए। इन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से संपर्क कर पूरी स्थिति से अवगत कराया। बोस ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे बहुत जल्द जमशेदपुर आएंगे।

परिस्थिति की गंभीरता समझते हुए नेताजी 18 अगस्त को जमशेदपुर पहुंच गए। प्रबंधन की चेतावनी के अमल करने में महज दो दिन बचे थे। अंतिम दिन यानी 20 अगस्त को उन्हें लेबर एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से अध्यक्ष घोषित किया। इसकी सूचना तत्काल टाटा प्रबंधन को दे दी गई। नेताजी के लेबर एसोसिएशन का नेतृत्व संभालते ही टाटा प्रबंधन में खलबली मच गई। प्रबंधन ने नेताजी को वार्ता का प्रस्ताव भेजा, जिसमें प्रबंधन का रूख नरम रहा। चार सितंबर को टाटा कंपनी के निदेशक जमशेदपुर आए।

उन्होंने भी नेताजी की मांगों को प्राथमिकता देते हुए कंपनी के महाप्रबंधक को एक सप्ताह के अंदर समझौता पत्र तैयार करने को कहा। 12 सितंबर 1928 को नेताजी के नेतृत्व में सम्मानजनक समझौता हुआ, तो तीन महीने 12 दिन की हड़ताल के बाद 13 सितंबर को श्रमिक काम पर लौटे। इस समझौते से न केवल टाटा प्रबंधन ने राहत महसूस की, बल्कि मजदूरों ने भी नेताजी का आभार जताया।

विभागीय बोनस के मुद्दे पर प्रबंधन ने लेबर एसोसिएशन के किसी भी निवेदन पर गहराई से विचार करने का आश्वासन दिया। सेवा की सुरक्षा : कर्मचारियों की शिकायतों पर विचार-विमर्श करने के लिए अंदरुनी कार्यप्रणाली गठित करने का आश्वासन मिला।

स्थानापन्न भत्ता (एक्टिंग एलाउएंस) : प्रबंधन ने स्थानापन्न भत्ता के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए इसे लागू करने का भरोसा दिया। पदनाम : प्रबंधन इस बात का ख्याल रखेगा कि मजदूरों को उचित पदनाम दिया जाए। शिशु कक्ष व विश्राम गृह : नवजात शिशुओं के लिए कक्ष और श्रमिकों के लिए विश्राम गृह बनाने के संबंध में शीघ्र कदम उठाए जाएंगे। मातृत्व लाभ : प्रबंधन मातृत्व लाभ योजना तैयार करके कंपनी के निदेशकों के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। भर्तीके लिए विज्ञापन : जब ऊंचे पदों पर बाहर के लोगों की नियुक्ति करनी होती तो भारतीय अखबारों में इसके विज्ञापन प्रकाशित किए जाएंगे। विभागीय शिकायतें : लेबर एसोसिएशन अब से जिन विभागीय शिकायतों को प्रबंधन के समक्ष रखेगा, उन पर आवश्यकतानुसार शीघ्रता से विचार किया जाएगा। प्रो.अब्दुल बारी को बनाया उत्तराधिकारीवर्ष 1936 तक नेताजी राष्ट्रीय आंदोलन में ज्यादा व्यस्त हो गए थे। इसी समय जब वे विएना से लौटे तो लेबर एसोसिएशन के नेताओं को सुझाव दिया कि कमेटी का पुनर्गठन किया जाए। वे अब जमशेदपुर में रहकर श्रमिकों का नेतृत्व करने में असमर्थ हैं। उस समय बिहार ल