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आरबीआई का बड़ा खुलासा: कृषि कर्ज माफी लेने वाले किसानों से बैंक करते हैं किनारा

जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली।ऐसे समय जब देश में किसानों के कर्ज माफ करने को लेकर जबरदस्त राजनीति शुरु हो गई है तब भारतीय रिजर्व बैंक ने एक ऐसे तथ्य का खुलासा किया है जिस पर सभी पक्षों को जरुर गौर करना चाहिए। तथ्य यह है कि एक बार जिन किसानों का कर्ज माफ हो जाता है उन्हें दोबारा खेती के लिए कर्ज लेने में दिक्कत होती है। बैंक उन किसानों को तरजीह देते हैं जिनके कर्ज माफ नहीं हुए हैं। वैसे यह भेदभाव बैंक आगे चल कर खत्म कर देते हैं, लेकिन तत्कालिक तौर पर कर्ज माफ कराने वाले किसानों के लिए माहौल परेशानी भरा होता है।

तमिलनाडु कृषि कर्ज माफी योजना पर विस्तृत रिपोर्ट में सामने आई बात

आरबीआइ ने यह खुलासा वर्ष 2016 में तमिलनाडु में किसानों की कर्ज माफी योजना पर जारी एक व्यापक समीक्षा रिपोर्ट में कही है। रिपोर्ट आरबीआइ के आर्थिक व नीतिगत शोध विभाग के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने तैयार की है जिसे आधिकारिक तौर पर आरबीआइ का नहीं माना जाता है लेकिन केंद्रीय बैंक की नीतियों में निश्चित तौर पर इस तरह की रिपोर्टो की झलक मिलती है।

कर्ज माफी लेने वाले किसानों को ज्यादा जोखिम वाले वर्ग में डाल देते हैं बैंक

रिपोर्ट में कर्ज माफी में शामिल किसानों को दोबारा कर्ज मिलने में आने वाली दिक्कत के पीछे सबसे बड़ी वजह यह बताई गई है कि बैंकों को यह भय रहता है कि वे दोबारा भी कर्ज नहीं चुकाएंगे। इसलिए वह बेहतर रिकॉर्ड वाले किसानों को कर्ज देते हैं। पिछले शुक्रवार को जारी आरबीआइ की सालाना ट्रेंड एंड प्रोग्रोस ऑफ बैंकिंग 2017-2018 में इस बात की पुष्टि होती है। इसमें पिछले वित्त वर्ष के दौरान कृषि कर्ज आवंटन की सालाना वृद्धि दर के 12.4 फीसद से घट कर 3.4 फीसद पर आने के लिए कई राज्यों में शुरु की गई कृषि कर्ज माफी योजना को ही कारण बताया गया है।

बहरहाल, केंद्रीय बैंक की इस रिपोर्ट (31 दिसंबर, 2018 को जारी) में वर्ष 2008 में तत्कालीन यूपीए सरकार की तरफ से जारी कृषि कर्ज माफी योजना का भी आकलन किया गया है। इस आकलन में पाया गया है कि देश के जिन जिलों में सबसे ज्यादा कृषि कर्ज माफ किये गये वहां बाद में किसानों को बेहद कम कर्ज आवंटित किया गया। इन जिलों को बैंकों ने ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्र घोषित कर दिया था और कर्ज देने में इनसे किनारा करने लगे थे। तब देश के छोटे व सीमांत किसानों के 52,516 करोड़ रुपये के कर्ज माफ किये गये थे।

तमिलनाडु कृषि कर्ज माफी योजना की अहमियत इसलिए है कि वर्ष 2016 में एआइडीएमके की सुप्रीमो स्वर्गीय जयललिता को विधान सभा चुनाव में जीत दिलाने में इस चुनावी घोषणा ने अहम भूमिका निभाई थी। उसके बाद महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और अब मध्य प्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ में भी उन्हीं दलों को सफलता मिली है जिन्होंने किसानों के कर्ज माफ करने का वादा किया है। बहरहाल, इस रिपोर्ट के मुताबिक तमिलनाडु के किसानों को वर्ष 2006 में भी कर्ज माफी मिली थी जिसका सरकारी खजाने पर 65,263 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा था। जबकि वर्ष 2016 के कर्ज माफी से 60,950 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा था। इन दो बड़ी कर्ज माफी योजना के अलावा भी इस राज्य में कई बार किसानों को ब्याज माफी जैसे कुछ अन्य रियायतें दी गई है। हालांकि रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार किया गया है कि इस तरह की योजनाओं से किसानों को फौरी तौर पर कुछ राहत तो मिल जाती है, लेकिन खेती के लेकर उनकी समस्या का यह स्थाई समाधान नहीं है।